
हर इंसान किसी न किसी का अधूरा लिखा हुआ किरदार होता है।
किसी ने ठीक ही कहा है—ज़िंदगी एक ऐसी किताब है जिसके पन्नों पर सब कुछ लिखा तो होता है, लेकिन पूरी तरह समझ कभी नहीं आता। और इसी किताब में हम सब एक-दूसरे के अधूरे किरदार हैं — कोई पूरा पढ़ नहीं पाता, तो कोई पूरा लिख नहीं पाता, और कोई पूरा समझ ही नहीं पाता।
हम सोचते हैं कि लोग हमारी कहानी का हिस्सा हैं, लेकिन वे हमारी कहानी में तो मुकम्मल किरदार बन जाते हैं, पर असल में हम उनकी कहानी में सिर्फ एक अधूरा किरदार बनकर ही रह जाते हैं। क्योंकि हर कहानी में, हर किसी के लिए एक अलग नजरिया होता है, और उसी नजरिये में हमारा किरदार कभी पूरी तरह अपनी जगह नहीं बना पाता। किसी की ज़िंदगी में हम शुरुआत बनकर आते हैं, तो किसी की यादों में अंत बनकर बस जाते हैं, और किसी की किताब में बिना आख़िरी लाइन लिखे, बस अधूरा किरदार बनकर रह जाते हैं। और फिर, हमारे साथ रह जाता है हमारा अधूरापन। शायद, यही अधूरापन ही हमें एक नई पहचान और एक अलग इंसान बनाता है।
हम तो वो कोरे कागज़ हैं, जिन पर वक़्त की स्याही कभी पूरी उतरती ही नहीं।
शायद हम सब किसी पुरानी अलमारी में रखी उस अधूरी डायरी की तरह हैं, जिसका लेखक बीच में ही कलम छोड़ कर चला गया। कभी-कभी हम किसी की आँखों में एक ‘उम्मीद’ बनकर चमकते हैं, पर दिल तक पहुँचते-पहुँचते महज़ एक ‘खामोशी’ बन जाते हैं। हम जुड़ते हैं ताकि मुकम्मल हो सकें, पर जुड़कर अक्सर यह जानते हैं कि हमारे हिस्से का जो खालीपन है, वो किसी और के लफ़्ज़ों से कभी भर ही नहीं सकता।
अजीब कशमकश है यह—हम जिसके लिए पूरी किताब लिखना चाहते हैं, और उसकी कहानी में हमारा ज़िक्र सिर्फ एक किनारे जितना होता है। सही मायने में हम सबके भीतर एक ऐसा किरदार सिसक रहा होता है जिसे कभी सुना ही नहीं गया होता, और एक ऐसा चेहरा छुपा है जिसे कभी देखा नहीं गया। हम सब एक-दूसरे की अधूरी दुआओं और आधे रह गए वादों का कलेक्शन हैं।
अंत में, हम सब बस एक याद बनकर रह जाते हैं—किसी के लिए मीठी, किसी के लिए कड़वी, पर हर किसी के लिए ‘अधूरी’। क्योंकि मुकम्मल तो सिर्फ कहानियाँ होती हैं, इंसान और उसके एहसासों को हमेशा एकांत और अकेलापन ही मिला है।